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Swami Vivekanand Story in Hindi स्वामी विवेकानन्द की कहानियां

  Swami Vivekanand Stories in Hindi

स्वामी विवेकानन्द जी की कहानियां


देश - भक्ति
यह प्रसंग स्वामी विवेकानन्द के बचपन का है।
उन्हें बचपन में नरेंद्र कहकर बुलाते थे। एक बार वे कलकत्ता में एक आम बेचने वाले की दुकान पर खड़े थे । वहां पर उन्होंने देखा कि एक विदेशी आदमी ने 1 किलोग्राम आम खरीदकर जा रहा है।

नरेंद्र ने ध्यान दिया कि दुकानदार ने उस विदेशी को कुछ खराब आम दे दिए थे।

नरेंद्र ने फौरन 1 किलोग्राम आम खरीदे और उस विदेशी व्यक्ति की ओर दौड़े और उन्हें रोककर बोले, " दुकानदार ने आपको कुछ खराब आम दे दिए हैं, आप वो खराब आम मुझे दे दीजिए और बदले में अच्छे आम ले लीजिए।"
विदेशी आदमी एक छोटे से बच्चे की इस बात से बहुत प्रभावित हुआ और उसने पूछा , " तुम अपने आम मुझे क्यों दे रहे हो और मुझसे खराब आम क्यों ले रहे हो?"
नरेंद्र ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया , " इसका एक ही कारण है कि मैं अपने देश का अपमान नहीं चाहता। "
विदेशी व्यक्ति जब कुछ समझ नहीं पाए तो नरेंद्र ने बताया कि अगर आप ये आम रख लेते और खराब आमों से आपको निराशा होती , फिर आप जब अपने देश वापस जाते तो अपने देशवासियों से आप भारत के आमों के विषय में बुराई करते। मैं यह नहीं चाहता।
एक छोटे से बालक की इतनी बड़ी सोच और देशभक्ति को देखकर वह विदेशी व्यक्ति बहुत प्रभावित हुए, और उन्होंने नरेंद्र से अच्छे आम ले लिए।
स्वामी विवेकानंद की कहानी




दोषी कौन?

एक बार नरेंद्र अपनी कक्षा में बैठे थे । उनके शिक्षक आगे से पढ़ा रहे थे। लेकिन नरेंद्र अपने दोस्तो के साथ बातें कर रहे थे।
मास्टर को यह अच्छा नहीं लगा । मास्टर ने अचानक नरेंद्र को उठाया और कुछ प्रश्न पूछे लेकिन नरेंद्र ने सारे प्रश्नों के उत्तर दे दिए ।    
    
जब मास्टर ने नरेंद्र के दोस्तो को भी कुछ सवाल पूछे तो उनको कोई भी उत्तर नहीं आया । उनके दोस्त कुछ भी उत्तर नहीं दे पाए ।

मास्टर ने उन सभी को हाथ ऊपर  करके  खड़े रहने की सजा दी।

   लेकिन उनके साथ नरेंद्र भी हाथ उठाकर खड़े हो गए। 
मास्टर ने उनसे पूछा कि तुमने सारे प्रश्नों के उत्तर दिए और सारे सही भी थे तो फिर तुम क्यों यहां सजा के लिए खड़े हो गए हो ।

नरेंद्र ने उत्तर दिया  - " गुरुजी ! मेरे दोस्त तो केवल मेरी बातो को सुन रहे थे । असल में मै ही बातें कर रहा था, तो इस प्रकार दोषी मेरे दोस्त नहीं बल्कि मै हूं ।"

यह सुनकर मास्टर जी ने कहा कि बेटा नरेंद्र तुम बहुत बड़े आदमी बनोगे ।

मास्टर जी की बातें सत्य साबित हुई । नरेंद्र ने ही स्वामी विवेकानंद के रूप में भारत का गौरव बढ़ाने का कार्य किया। और भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के पथ पर अग्रसर किया।



                      डरो मत सामना करो।

स्वामी विवेकानन्द जी की भारत यात्रा के दौरान वे बहुत सारे स्थानों पर गए और भारत भूमि के बारे में और अधिक ज्ञान प्राप्त किया। 
ऐसे ही वाराणसी में एक बार स्वामी विवेकानन्द जी दुर्गा माता जी के मंदिर में रुके थे , स्वामी जी ने माता के दर्शन और पूजा आदि की और फिर विवेकानंद जी प्रसाद लेकर मंदिर से बाहर की और निकल गए।
मंदिर के आस पास बहुत सारे बंदर भी रहा करते थे जो अक्सर भोजन की तलाश में रहते थे ।
स्वामी जी के हाथ में प्रसाद देखकर बंदर प्रसाद खाने के लिए स्वामी जी की ओर आने लगे।
बंदरों ने स्वामी विवेकानन्द जी को घेर लिया।

खतरे का एहसास पाकर स्वामी जी बचकर भागने का प्रयत्न करने लगे।
Best 4 Swami Vivekanand Stories in Hindi स्वामी विवेकानन्द की कहानियां
स्वामी विवेकानन्द की कहानियां



 जैसे जैसे स्वामी जी चलते बंदर उनके पीछे आते , स्वामी जी प्राणों की रक्षा के लिए भागने लगे।
साथ ही बंदर भी उनके पीछे भागने लगे।  

विवेकानंद जी भागते भागते मन्दिर के मुख्य प्रांगण में आ गए , वहां पर मंदिर के पुजारी ने जब यह देखा तो उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी को आवाज़ दी।
"रुको ! उनसे डरो मत ! उनका सामना करो !! "
यह वाक्य सुनकर विवेकानंद जी प्रभावित हुए और 
विवेकानंद जी पलटे और बंदरो की ओर बढ़ने लगे।

अब स्वामी जी निडर होकर बंदरों की ओर बढ़ रहे थे , बंदरों ने स्वामी जी से खतरा महसूस किया और स्वामी जी जैसे जैसे आगे बढ़ते बंदर भी पीछे हटते जाते।
अंत में बंदरों की पूरी टोली वहां से भाग गई और स्वामी जी की जान भी बच गई।

यह घटना स्वामी जी के जीवन के लिए एक बहुत अच्छी सीख बन गई , स्वामी जी समझ गए कि ,"जीवन में यदि कोई समस्या आती है तो पलटकर जवाब देना चाहिए , यही एकमात्र मार्ग है जिससे उस समस्या का समाधान हो सके! , समस्याओं से डरकर पीछे हटना नादानी है। "

दोस्तों स्वामी जी का यह प्रसंग हमारे जीवन के भी कई पहलुओं पर लागू होता है । समस्याएं हर किसी के जीवन में आती हैं फिर चाहे वो राजा हो या फकीर , छोटा हो या बड़ा, मनुष्य हो अथवा जानवर, अतः समस्या का समाधान तभी है जब उससे डरने की बजाय उससे लड़ने का साहस जुटाया जा सके। समस्या मानसिक हो या भौतिक , उसका समाधान कहीं ना कहीं अवश्य होता है। इसलिए कभी समस्याओं को देखकर घबराए ना बल्कि स्वामी जी की तरह डटकर उसका सामना करें।

 व्यक्तित्व की पहचान


यह बात उस समय की है जब स्वामी विवेकानंद जी 1893 में विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका गए थे।

अमेरिका के शिकागो शहर में विवेकानंद को आए हुए कुछ ही दिन हुए थे। एक शाम वे सैर करने के लिए शहर की सड़कों पर घूम रहे थे।
स्वामीजी ने उस समय एक भारतीय सन्यासी की भांति पारम्परिक गेरूए (भगवे) रंग के वस्त्र पहने हुए थे।

यह पहनावा अमेरिकी लोगों के लिए बहुत अजीब था।

स्वामी जी को ऐसे वस्त्रों में देखकर वहां के लोग उन पर व्यंग्य करने लगे। स्वामीजी के वस्त्रों का मजाक बनाकर उन पर हंसने लगे।

अब कुछ लोगों का एक समूह उनके पीछे पीछे चलने लगा , वे लगातार उन पर हंसते और उनका मजाक बनाते।
 
  बहुत समय तक स्वामी जी चुपचाप बिना कुछ बोले हुए चलते रहे।
 जब अमेरिकी लोग लगातार उनका पीछा करने लगे तो स्वामी जी मुड़े और बोले , 
" मैं भली भांति समझ रहा हूं कि आप सभी मेरे पहनावे को देखकर हंस रहे हैं ; आपके देश में व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों से , उसके पहनावे से होती है।
लेकिन वास्तव में व्यक्ति की पहचान उसके पहनावे से ना होकर उसके व्यक्तित्व से होती है , उसके आचरण से होती है , उसके गुणों से होती है।" 

स्वामी जी की बातें अमेरिकी लोगों को चुभी जरूर लेकिन कुछ दिनों के बाद जब स्वामी जी का भाषण अमेरिकी अखबारों में प्रकाशित हुआ तो यही लोग स्वामी जी से क्षमा मांगकर उनके शिष्य बन गए।


Swami Vivekanand Stories in Hindi #4



स्वामी विवेकानंद की कहानी
Img By - Pixabay


                        सन्यासी


स्वामी विवेकानन्द जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर एक बार एक महिला ने उनसे कहा -"स्वामी जी आप मुझसे शादी कर लीजिए ताकि आपसे शादी के बाद जो पुत्र प्राप्त होगा ,वो बिल्कुल आपके जैसा होगा और मुझे आप जैसे व्यतित्व की माता बनने का गौरव प्राप्त होगा ।"

यह सुनकर स्वामी जी हल्का सा मुस्कुराए और कुछ देर तक सोचने के बाद बोले -"मैं एक सन्यासी हूं मेरे जीवन में विवाह का कोई स्थान नहीं है अर्थात मैं विवाह नहीं कर सकता हूं , आप मुझे ही अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लीजिए । इस प्रकार से आपकी इच्छा भी पूरी हो जाएगी और मेरा सन्यास भी सतत बना रहेगा।"

स्वामी जी का यह कथन सुनकर वह महिला स्वामी जी के चरणों में गिर गई और उसने उनसे क्षमा मांग ली।
     
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