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प्रतापगढ़ की कहानी Hindi Stories For Kids

प्रतापगढ़ की कहानी Hindi Stories For Kids

एक बार की बात है, प्रतापगढ़ नामक राज्य बहुत दु:खों से गुजर रहा था। वहाँ के महाराजा विक्रम सिंह ने अपने भोग और विलास की पूर्ति के लिए जनता पर कई कर लगाये थे जिस कारण वहाँ की जनता उससे बहुत परेशान थी और उससे जल्द से जल्द छुटकारा पाना चाहती थी।
प्रतापगढ़ की कहानी
प्रतागढ़ की कहानी


महाराजा विक्रम सिंह एक विस्तृत राज्य का राजा था और उसकी  सैन्य शक्ति भी बहुत प्रबल थी।
प्रतापगढ़ की प्रतापी और अजेय सेना ने कई युद्ध जीते थे। अतः कोई भी पड़ोसी राज्य का राजा प्रतापगढ़ पर हमला करने के विचार से ही भयभीत हो जाता था।

 किसी भी अन्य राज्य का राजा प्रतापगढ़ की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखता था।

विक्रम सिंह इतना निर्दयी और क्रूर था कि अगर कोई उसके राज्य में उसके विरुद्ध आवाज़ उठाता या उसके आदेश का पालन नहीं करता  तो वह उसे जंगली शेरों के बाड़े में डाल देता था।

यहाँ तक कि उसने खुद के चाचा और अपने बड़े भाई को भी नही छोड़ा उनकी मामूली गलती पर उनको मृत्युदंड दे दिया था, अब उसके कुल में उसके अलावा कोई और शेष नहीं था। उसके अहंकारी और क्रोधी स्वभाव के कारण किसी भी राजकुमारी ने उसे अपना पति बनाना स्वीकार नहीं किया।

  प्रतापगढ़ की जनता को राजा की आज्ञानुसार अपनी कमाई का आधा धन और अनाज का आधा हिस्सा राज्य के कोष में कर के रूप में जमा करना पड़ता था।

  इतने क्रूर तथा अत्याचारी राजा से वहां की जनता किसी भी हालत में छुटकारा पाना चाहती थी।

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जब कभी वो शिकार करने जाता और यदि उसका निशाना सही न लगे तो उसके सैनिक उसके डर के मारे उसके निशाने को सही कहते और कहते उस जानवर की किस्मत अच्छी है कि  हवा के कारण तीर मुड़ गया वरना हमारे महाराज के निशाने से आजतक भला कौन बच पाया है ?

ऐसे ही कई खेलों में उसके साथी अथवा जनता स्वयं हार जाती क्योंकि वे अपनी जान बचाना चाहते थे। विक्रम सिंह को यह कतई मंजूर नहीं था कि कोई भी उसे हराए और यदि कोई ऐसा दुसाहस करता तो राजा उसे मृत्युदंड देता था।

जनता की आशा केवल राज्य के एक सुकुमार नामक युवक पर थी जो स्वयं राजा के दरबार का सलाहकार था।वह राजा को कई बार मृत्यु के घाट उतारने की योजना कर चुका था लेकिन हमेशा वह विफल होता रहा। उसे सदैव एक अवसर की इच्छा रहती थी कि कब वो राजा की मृत्यु का कारण बन सके!

एक ओर प्रतापगढ़ की जनता विक्रम सिंह के अत्याचारों से जूझ रही थी वहीं राज्य के घने जंगलों में आदिवासी समुदाय अपने मुखिया, सरदार कामेत के साथ अपना जीवन ख़ुशी से व्यतीत कर रहे थे।

सरदार कामेत ने भी महाराजा विक्रम सिंह के अत्याचारों के बारे में सुना था और वह चाहता था कि उसके समुदाय के बारे में गलती से भी राजा या उसके गुप्तचरों को भनक तक न लगे वरना वह उसके समुदाय को भी अपने राज्य में सम्मिलित कर देगा और उसकी जनता को भी राजा विक्रम सिंह के आत्याचारों को सहना पड़ेगा ,इसलिये उसने अपनी जनता को जंगल से बाहर जाने से मना किया था और उसकी जनता इसका पालन भी करती थी।

एक दिन सरदार कामेत नदी के किनारे एक पेड़ के नीचे लेटा हुआ अपनी जनता के सुखों के बारे में सोच रहा था कि उसकी नज़र पेड़ पर बैठी चिड़िया पर  पड़ी।

   उसने देखा कि वह पेड़ पर लगे छोटे-छोटे फलों को खा रही थी। उसने सोचा कि अगर यह चिड़िया इस फल को खा रही है और उसको कुछ नहीं हो रहा इसका मतलब ये फल हम भी खा सकते हैं।

 उसने तुरंत पेड़ से एक फल तोड़ा और चखा तो उसका स्वाद बहुत मीठा था उसने उस फल के बारे में अपनी जनता को बताया।

  सभी ने एक-एक फल तोड़ा और खाया सभी को फल का स्वाद बहुत अच्छा लगा उनमे से एक व्यक्ति ने बिना सरदार की आज्ञा के दो और फल निकाले और उनको खा दिया। फल खाते ही उसको प्यास लगी लेकिन उसके पानी पीते ही उसकी मृत्यु हो गयी।

सरदार ने अपनी जनता को यह आदेश दिया कि कोई भी एक बार में तीन फलों को नहीं खायेगा साथ ही किसी से गलती से भी फल नदी में ना गिरे इसका विशेष ध्यान दिया जाय क्योंकि यह नदी प्रतापगढ़ से होकर गुजरती है अगर फल नदी में गिरा तो प्रतापगढ़ में किसी न किसी को वह नदी में मिल जायेगा और वह उसे राजा को देगा, राजा उसका स्वाद चखते ही सम्पूर्ण पेड़ को पाने की इच्छा करेगा और पक्का उसके सैनिक फल के पेड़ को ढूंढते हुए हम तक पहुच जायेंगे और हमे उनका गुलाम बनना पड़ेगा।

सरदार की आज्ञा का सबने पालन किया लेकिन एक दिन जिसका डर था वही हुआ एक फल गलती से नदी में गिरा और राजा के हाथों लग गया उसका सेवन करते ही राजा विक्रम सिंह ने सुकुमार को एक सेना की टुकड़ी के साथ नदी के किनारे होते हुए जंगल में उस फल के पेड़ को ढूंढने का आदेश दिया।

सुकुमार ने महाराज की आज्ञानुसार पेड़ ढूढना शुरू किया और आखिरकार सरदार कामेत के क्षेत्र में पहुचे जहाँ पर वह विशाल फल का पेड़ था।

सरदार के सैनिकों ने उनको रोकने का प्रयास किया तो विक्रम सिंह के सैनिकों ने उन्हें वहीं पर मार डाला।

 अपनी जनता की रक्षा के लिए सरदार ने उनको पेड़ ले जाने दिया लेकिन उनको यह नहीं बताया कि कोई भी एक बार में तीन फलों को नही खायेगा और तुरंत पानी नही पिएगा वरना मृत्यु निश्चित है।

सुकुमार पेड़ उखाडकर प्रतापगढ़ पहुंचे, महाराज को उसके बारे में सूचित किया गया तो महाराज भागते हुए फल खाने अपने राजमहल के बाग में आए।

महाराज ने एक साथ कई फल खा लिए और इसके बाद उसको प्यास लगी उसने जैसे ही पानी पिया उसकी तत्काल मृत्यु हो गयी।

जनता को लगा कि यह सब सुकुमार की योजना है लेकिन सुकुमार ने उनको सारी बात बताई। सुकुमार पुनः जंगल में गया वहाँ सरदार को महाराजा विक्रम सिंह की दुर्गति के बारे में सब कुछ बताया।

  सरदार भी खुश हुआ की उसकी वजह से प्रतापगढ़ की जनता विक्रम सिंह के अत्याचारों से मुक्त हो गया।
सुकुमार, सरदार कामेत और उसकी जनता को सम्मान सहित प्रतापगढ़ ले गया ।

महाराजा विक्रम सिंह का कुल समाप्त हो गया था इसलिये वहाँ की जनता ने सरदार कामेत को अपना महाराजा बना दिया।

महाराजा कामेत ने अपनी जनता पर लगे सभी करों को हटाया और उनके हित में कई अन्य कार्य किये।

अब प्रतापगढ़ की जनता बहुत खुश थी और पड़ोसी राज्य प्रतापगढ़ के मित्र बन गये।
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